Tuesday, October 28, 2014

Ek sher


दोस्तो, बहुत दिनों बाद लौटा हूँ , ब्लॉगिंग की दुनिया में.  

Saturday, November 3, 2012

दर्द की दास्ताँ सुनाने में।
देर कर दी क़रीब आने में।

हादसा था पलक झपकने का
मुद्दतें लग गईं भुलाने में।

उसका कुछ दर्द कम हुआ शायद
क्या गया मेरा मुस्कुराने में।

यूं न हैरान हो की ज़िंदा हूँ
वक़्त लगता है जान जाने में।

एक तस्वीर के सहारे भला
कौन जीता है इस ज़माने में।

कश्तियों की तमाम उम्र गयी
ज़ोर लहरों का आज़माने  में।

रास आयी न जब चमन की फ़ज़ा
लौट आया वो क़ैदखाने में।

जाने किस-किस ने साज़िशें देखीं
एक मस्ती भरे तराने में।

आंधियों में बिखर न जाएँ शजर
इन हवाओं से सुर मिलाने में।

अब 'सजल' ढूंढ के रहेगा सहर
इस सियाह रात के फ़साने में।



Saturday, June 16, 2012

My ghazal published in Anbhaya saancha years back

सोती आँखें.
रोती आँखें.

कितने ख्वाब
संजोती आँखें.

सीप में जैसे
मोती आँखें.

काश सभी की
होती आँखें.

कितने मंज़र
ढोती आँखें.

प्यार के सपने
बोती आँखें.

'सजल' शराफ़त
खोती  आँखें.

Wednesday, October 26, 2011

डूब जाने का तो डर होता है.
फिर भी हर रोज़ सफ़र होता है.

वो किनारों पे ही रह जाते हैं
जिनको तूफ़ान का डर होता है. 

बहते धारों के रुख बदल देना 
ये कहाँ सब में हुनर होता है.

सबमें तूफ़ान अपने अपने हैं
सबके अन्दर ही भंवर होता है.

लूटने वालों को मिलते हैं समर
चोट खाने को शजर होता है.

ऐ मेरी जाँ मैं वही हूँ  लेकिन
उम्र का कुछ तो असर होता है.

सूखे पेड़ों पे बहारों का असर
कम ही होता है, मगर होता है.

जब मैं इस और चला आता हूँ
तब कोई और उधर होता है.

जब नहीं होता अपने साथ 'सजल'
किसको मालूम किधर होता है.

समर=फल
शजर=पेड़



Monday, March 28, 2011

आते आते यार समंदर.
लौट गया हर बार समंदर.

मैं सहरा हूँ मुझ में भी है
रेत का पानीदार समंदर.

तू क्या जाने क्या होती है
पानी की बौछार समंदर.

काश मुझे भी हासिल होतीं
बूंदें ये दो चार समंदर.

एक तलैया मेरे अन्दर
ढूँढ रही विस्तार समंदर.

एक लहर मुझको भी दे दे
मैं भी उतरूँ पार समंदर.

सारी दुनिया देख रही है
लहरों की तक़रार समंदर.

जीवन लेना जीवन देना
ये कैसा व्यापार समंदर.

पानीदार = चमकता हुआ


Sunday, March 20, 2011

फूल दिखला के मेरे ज़ख्म खिलाने वाले.
लौट के आ ऐ मुझे छोड़ के जाने वाले.

मुझ को दे देंगे सज़ा मौत की सौ बार, अगर
मेरी नज़रों से मुझे देखें ज़माने वाले.

मैं तो क़ैदी हूँ मुझे यूँ ही पड़ा रहने दे
बाँध के पंख मेरे मुझको उड़ाने वाले.

उनको मालूम नहीं कौन यहाँ रहता था
किसका घर फूँक के आये हैं जलाने वाले.

उसने पूछा जो कभी रोक न पाए खुद को
राज़ सब कह दिए जो जो थे छुपाने वाले.

हम तो ये सोच के बस उनका कहा मान गए
रूठ न  जाएँ कहीं हमको मनाने वाले.

ये सदा अर्श के पर्दों को हिला सकती है
मेरी आवाज़ में आवाज़ मिलाने वाले.

घर में यादों के 'सजल' दीप जला रखे हैं
देखे किस तरह भुलाते हैं भुलाने वाले.

क़तरा क़तरा वो रात ढलती रही.
ज़िन्दगी हाथ से निकलती रही.

मैं खड़ा रह गया  किनारे पर
वो अकेली लहर से लड़ती रही.

मेरे घर को न कर सकी रोशन
आसमान से ज़िया उतरती रही.

कुछ हुआ यूँ कि उम्र भर मंज़िल
दो  क़दम दूर  हमसे चलती  रही.

हम तो अपनी ही राह पर थे मगर
रोशनी   ज़विए   बदलती   रही.

कश्तियाँ धंस गयी किनारों पर
एक कागज़ कि नाव चलती रही.

सबने देखा कि कायनात-ए-सजल
बस यूँ ही टूटती बिखरती रही.


ज़िया -  रोशनी
ज़विए - कोण
कायनात-ए-सजल - सजल की दुनिया


Saturday, January 9, 2010

जितनी पानी में उतरती जाए।

तशनगी सीप की बढ़ती जाए।

कैसी बारिश है ये कैसा पानी।

आग सीने में दहकती जाए।

धूप सूरज से किनारा कर ले

चाँदनी चाँद से डरती जाए।

आईना मुझसे पशेमान न हो

मेरी सूरत ही बदलती जाए।

आसमाँ भी नहीं सर पे मेरे

और धरती भी सरकती जाये।

कश्तियाँ ढेर हैं किनारों पर

मौज दरिया में उछलती जाए।

है 'सजल' उसके लम्स की खुशबू

या हवा यूँ ही महकती जाये।

Thursday, July 23, 2009

अनभै सांचा के अंक १४ में प्रकाशित

दिल में उठते हैं शरारे और भी।

इन हवाओं के सहारे और भी।

हैं कई तूफ़ान सागर में अभी

और सागर के किनारे और भी।

मौसमों के राज़ खुलने दे ज़रा

कर रही है रुत इशारे और भी।

पत्थरों से मैं ही क्यूँ टकरा गया

थे नदी में बहते धारे और भी।

जो कड़कती और थोडी बिजलियाँ

पास आते हम तुम्हारे और भी।

क्या हुआ जो चाँद फिर निकला नहीं

आसमाँ में हैं सितारे और भी।

इक अकेले तुम नहीं डूबे 'सजल'

कोई रह रह के पुकारे और भी।

अनभै सांचा के अंक १४ में प्रकाशित

देख लहरों में से निकला हुआ सर देख ज़रा।

पानी पानी हुआ ख्वाबों का वो घर देख ज़रा।



मैं तेरे ज़ोर-ओ-सितम करने की हद देखूंगा

तू मेरे जुल्मों को सहने का हुनर देख ज़रा।



मैं कहीं हूँ तू कहीं लख्त-ए-  जिगर और कहीं
सूखे पत्तों पे हवाओं का असर देख ज़रा।



यूँ तो मंज़र हैं ज़माने में ज़माने भर के

देखता हूँ मैं जिधर तू भी उधर देख ज़रा।



पार जाते वो सफीने तो सभी ने देखे

मेरी इस डूबती कश्ती का सफर देख ज़रा।





Sunday, June 28, 2009

अनभै सांचा में प्रकाशित

क्या तेरे दिल में है बता साहिल।
रेत के ज़र्रे न उड़ा साहिल।

तेरे आगोश में समंदर है
और अब चाहता है क्या साहिल।

जाती लहरों को अलविदा कह दे
आती लहरों में डूब जा साहिल।

मुझ में भी कारवां है मौजों का
आ मुझे भी गले लगा साहिल।

सूखी झीलों में दरिया रहते हैं
छेड़ न इनको न जगा साहिल।

कश्तियाँ कैसे लौट पायेंगी
रुख बदलती नहीं हवा साहिल।

कितने दरिया 'सजल' गए आए
तूं न बदला वहीँ रहा साहिल.

Tuesday, June 23, 2009

अनभै सांचा के अंक २ में प्रकाशित


चप्पा-चप्पा इस ज़मीं को दल रहीं थीं आंधियां।
कौन जाने किस दिशा से चल रही थीं आंधियां।

हमको तो ऐसा लगा सदियाँ हमारी खो गयीं
लोग कहते हैं की पल दो पल रहीं थीं आंधियां।

तुम ये समझे बस तुम्ही थे ग़र्दिश-ए-तूफ़ान में
हमको भी कुछ इस तरह ही दल रहीं थीं आंधियां।

बात इतनी थी मगर क्यूँ आ गया तूफ़ान सा
कौन जाने कब से दिल में पल रहीं थीं आंधियां।

अब के बारिश में सुना है वो शजर भी गिर गए
जिनके पत्तों के सहारे चल रहीं थीं आंधियां।

अक्स अपना देख कर वो डर गया घबरा गया
आईने हाथों में लेकर चल रहीं थीं आंधियां।

अब नहीं मिल पाएंगे उस रेत पर मेरे निशाँ
मैं चला था जब वहाँ से चल रहीं थीं आंधियां।

Friday, June 19, 2009

अनभै सांचा में प्रकाशित

छोटी बहर की ग़ज़ल

ये सबा अजनबी।
ये फजा अजनबी।

दिल से निकली है
पर है सदा अजनबी।

मुझ को देखा कहीं

क्या बता अजनबी।

ज़िन्दगी है नई

फ़लसफा अजनबी।

आइनें में मुझे

मैं लगा अजनबी।

इस शहर में हर इक

हादसा अजनबी।

घर में अपने रहा

पर रहा अजनबी।

चाँदनी रात थी

चाँद था अजनबी।

एक पहचानी धुन

हमनवा अजनबी।

मेरे गीतों का हर

तर्जुमा अजनबी।

नाज़-नखरा वही

पर अदा अजनबी।

दिल में मौजों का इक

सिलसिला अजनबी।

मीत दे कर गया

इक सज़ा अजनबी।

बोल जायूँ कहाँ

हर दिशा अजनबी।

इस 'सजल' को मिली

हर दुआ अजनबी।






धन्यवाद प्रवीण जी तथा केसरी जी। वीनस जी अनभै सांचा साहित्य और संस्कृति की एक त्रैमासिक पत्रिका है जिसमे रचनाएं गुणवत्ता के आधार पर छपी जाती हैं न कि जान-पहचान अथवा विचारधारा के आधार पर। संपादक द्वारका प्रसाद जी का निर्णय इसमे अन्तिम होता है यद्यपि वे उचित व्यक्ति से विचार विमर्श अवश्य कर लेते होंगे. ग़ज़ल का नियमित सेक्शन अनभै सांचा की पहचान बन चुका है। बड़े नामों के साथ साथ नए नामों की उत्कृष्ट रचनाओं को भी अनभै सांचा बे-हिचक छपता है। आप अपनी रचनाएँ bhejne या पत्रिका mangwaane के लिए likhen

द्वारका प्रसाद charumitra

१४८, kadambari, sector ९, rohini

delhi-८५

ईमेल : anbhaya.sancha@yahoo.co.in

Saturday, June 13, 2009

सीप और बूँदें

नीलाम्बरा में प्रकाशित

बूँदें

सीप के

मुख में गिरकर

अक्सर मोती बन जाती हैं

और सीपें

अक्सर

प्यासी रह जाती हैं।

मृग्कन्या

नीलाम्बरा में प्रकाशित एक लघु कविता

मृगकन्या
जंगल में अधिक सुरक्षित
महसूस करती है
क्योंकि
वहाँ भेड़िया,
भेड़िया ही नज़र आता है,
उसके आदमी के खाल में होने का
डर नहीं है ,
क्योंकि
जंगल,
जंगल है,
शहर नहीं है।

अनभै सांचा में प्रकाशित

वो परिंदे फ़िर से शायद लौट के आयें यहीं।

देर तक वो टहनियां इस आस में हिलती रहीं।

अब नहीं आती मेरे दिल की ज़मीं तक रोशनी

एक जंगल उग गया है जिस्म के अन्दर कहीं।

दलदलों में वो खड़ा था चाँद के सपने लिए

ख्वाब उसके क्या कहें, uska pataa miltaaa nahin.

भर लो तुम अपनी उडानें, dhoond lo apnaa जहाँ

तुम पुकारोगे जहाँ से पाओगे मुझको वहीँ।

हसरतें मेरी मेरे दिल में ही रहने दो 'सजल'

रोक पायेंगे कहाँ साहिल जो ये नदियाँ baheen .

अनभै सांचा में प्रकाशित

रह रह के लहू रिश्ता रहा आसमान से।

ये कैसा तीर चल गया मेरी कमान से।

रखने को अपने पाँव ज़मीं ढूंढता रहा

जब थक गया वो अर्श की ऊंची उड़ान से।

टूटा था एक पंख मगर उड़ रहा था वो

लड़ता रहा वो लड़ सका जब तक विधान से।

कितने जतन से हमने मिटाए थे फासले

फ़िर गार कितने बन गए उनके ब्यान से।

बादल से झांकती हुई किरणों ने ये कहा

अब तो 'सजल' हटाईये परदे मकान से।

Tuesday, June 9, 2009

अनभै सांचा में प्रकाशित

क्या तेरे दिल में है बता साहिल।

रेत के ज़र्रे न उड़ा साहिल।

तेरे आगोश में समंदर है

और अब चाहता है क्या साहिल।

जाती लहरों को अलविदा कह दे

आती लहरों में डूब जा साहिल।

मुझ में भी कारवां है मौजों का

आ मुझे भी गले लगा साहिल।

सूखी झीलों में दरिया रहते हैं

छेड़ न इनको न जगा साहिल।

कश्तियाँ कैसे लौट पायेंगी

रुख बदलती नहीं हवा साहिल।

कितने दरिया 'सजल' गए आए

तूं न बदला वहीँ रहा साहिल.

Sunday, June 7, 2009

साहित्य एवं संस्कृति की त्रैमासिक पत्रिका अनभै सांचा में प्रकाशित

कतरा कतरा वो रात ढलती रही।
ज़िन्दगी हाथ से फ़िसलती रही।

मैं खड़ा रह गया किनारे पर
वो अकेली लहर से लड़ती रही।

मेरे घर को न कर सकी रो़शन
आसमां से ज़िया उतरती रही।

मिल न पायी कभी खुशी हमको
दो क़दम दूर हमसे चलती रही।

कश्तियाँ धंस गयीं किनारों पर
एक कागज़ की नाव चलती रही।

सबने देखा कायनात -ऐ -सजल
बस यूँ ही टूटती बिखरती रही।