Monday, March 28, 2011
Sunday, March 20, 2011
ज़िन्दगी हाथ से निकलती रही.
मैं खड़ा रह गया किनारे पर
वो अकेली लहर से लड़ती रही.
मेरे घर को न कर सकी रोशन
आसमान से ज़िया उतरती रही.
हम तो अपनी ही राह पर थे मगर
रोशनी ज़विए बदलती रही.
कश्तियाँ धंस गयी किनारों पर
एक कागज़ कि नाव चलती रही.
सबने देखा कि कायनात-ए-सजल
बस यूँ ही टूटती बिखरती रही.
ज़िया - रोशनी
ज़विए - कोण
कायनात-ए-सजल - सजल की दुनिया
Saturday, January 9, 2010
जितनी पानी में उतरती जाए।
तशनगी सीप की बढ़ती जाए।
कैसी बारिश है ये कैसा पानी।
आग सीने में दहकती जाए।
धूप सूरज से किनारा कर ले
चाँदनी चाँद से डरती जाए।
आईना मुझसे पशेमान न हो
मेरी सूरत ही बदलती जाए।
आसमाँ भी नहीं सर पे मेरे
और धरती भी सरकती जाये।
कश्तियाँ ढेर हैं किनारों पर
मौज दरिया में उछलती जाए।
है 'सजल' उसके लम्स की खुशबू
या हवा यूँ ही महकती जाये।
Thursday, July 23, 2009
अनभै सांचा के अंक १४ में प्रकाशित
दिल में उठते हैं शरारे और भी।
इन हवाओं के सहारे और भी।
हैं कई तूफ़ान सागर में अभी
और सागर के किनारे और भी।
मौसमों के राज़ खुलने दे ज़रा
कर रही है रुत इशारे और भी।
पत्थरों से मैं ही क्यूँ टकरा गया
थे नदी में बहते धारे और भी।
जो कड़कती और थोडी बिजलियाँ
पास आते हम तुम्हारे और भी।
क्या हुआ जो चाँद फिर निकला नहीं
आसमाँ में हैं सितारे और भी।
इक अकेले तुम नहीं डूबे 'सजल'
कोई रह रह के पुकारे और भी।
अनभै सांचा के अंक १४ में प्रकाशित
पानी पानी हुआ ख्वाबों का वो घर देख ज़रा।
मैं तेरे ज़ोर-ओ-सितम करने की हद देखूंगा
तू मेरे जुल्मों को सहने का हुनर देख ज़रा।
यूँ तो मंज़र हैं ज़माने में ज़माने भर के
देखता हूँ मैं जिधर तू भी उधर देख ज़रा।
पार जाते वो सफीने तो सभी ने देखे
मेरी इस डूबती कश्ती का सफर देख ज़रा।
Sunday, June 28, 2009
अनभै सांचा में प्रकाशित
क्या तेरे दिल में है बता साहिल।
रेत के ज़र्रे न उड़ा साहिल।
तेरे आगोश में समंदर है
और अब चाहता है क्या साहिल।
जाती लहरों को अलविदा कह दे
आती लहरों में डूब जा साहिल।
मुझ में भी कारवां है मौजों का
आ मुझे भी गले लगा साहिल।
सूखी झीलों में दरिया रहते हैं
छेड़ न इनको न जगा साहिल।
कश्तियाँ कैसे लौट पायेंगी
रुख बदलती नहीं हवा साहिल।
कितने दरिया 'सजल' गए आए
तूं न बदला वहीँ रहा साहिल.
