रोती आँखें.
कितने ख्वाब
संजोती आँखें.
सीप में जैसे
मोती आँखें.
काश सभी की
होती आँखें.
कितने मंज़र
ढोती आँखें.
प्यार के सपने
बोती आँखें.
'सजल' शराफ़त
खोती आँखें.
जितनी पानी में उतरती जाए।
तशनगी सीप की बढ़ती जाए।
कैसी बारिश है ये कैसा पानी।
आग सीने में दहकती जाए।
धूप सूरज से किनारा कर ले
चाँदनी चाँद से डरती जाए।
आईना मुझसे पशेमान न हो
मेरी सूरत ही बदलती जाए।
आसमाँ भी नहीं सर पे मेरे
और धरती भी सरकती जाये।
कश्तियाँ ढेर हैं किनारों पर
मौज दरिया में उछलती जाए।
है 'सजल' उसके लम्स की खुशबू
या हवा यूँ ही महकती जाये।
दिल में उठते हैं शरारे और भी।
इन हवाओं के सहारे और भी।
हैं कई तूफ़ान सागर में अभी
और सागर के किनारे और भी।
मौसमों के राज़ खुलने दे ज़रा
कर रही है रुत इशारे और भी।
पत्थरों से मैं ही क्यूँ टकरा गया
थे नदी में बहते धारे और भी।
जो कड़कती और थोडी बिजलियाँ
पास आते हम तुम्हारे और भी।
क्या हुआ जो चाँद फिर निकला नहीं
आसमाँ में हैं सितारे और भी।
इक अकेले तुम नहीं डूबे 'सजल'
कोई रह रह के पुकारे और भी।